Sunday, March 23, 2025

औरग़ज़ेब का महिमामंडन

औरग़ज़ेब को महिमामंडित करने वालों से निपटना आवश्यक है!

* औरंगज़ेब की कब्र नहीं उखाड़ो, बल्कि उसका महिमामंडन करने वालों की मानसिकता खोद डालो!

* आक्रांता सैयद सालार मसूद गाजी के नाम पर उर्स (नेजा मेला) को बंद न करवा कर उस मेले में जाना ही बंद कर दो!


कल दो महत्वपूर्ण घटनाएं प्रकाश में आयी, एक नागपुर और दूसरी संभल, उत्तरप्रदेश से। नागपुर में बिना आगा-पीछा सोचे और बिना पुख्ता तैयारी के औरंगज़ेब की कब्र हटाने के लिए पहुंचे पानी के बुलबुले, जो थोड़ा सा हड़का देने भर से ही अपनी जान बचा कर भागते दिखे। और फँस गए बेचारे वो निर्दोष असावधान हिन्दू नागरिक जो उस जगह अपनी गाड़ियों को बाहर सडकों पर छोड़कर सरकार के भरोसे आराम से निश्चिंत होकर अपने-अपने घरों में आराम कर रहे थे। जबकि उनलोगों ने शायद पहले से ही पुख्ता तैयारीया की हुई थी, और भली-भांति जानते थे की इन समस्या से किस प्रकार से निपटा जा सकता है। तो अंततः नुकसान किसका हुआ? हम आप यहाँ सोच-सोच कर खुश हो रहे हैं, की 50 FIR हो चुकी है, इतनी गिरफ्तारियां हो रही है, CCTV से चेहरों की पहचान हो गयी है, टीवी डिबेट में हमारे प्रवक्ता ने उसको धो डाला, फलां जगह बुलडोजर चला दिया गया, मोदी, योगी, फडणवीस ने हमको बचा लिया आदि। परन्तु क्या आपने कभी सोचा है, की उन गिरफ्तार लोगों में इसका क्या प्रभाव पड़ा? उन लोगों को एकाध सप्ताह में मिलोट से जमानत मिल जाएगी, इस शहर को छोड़ कर किसी दूसरे शहर में जा बसेंगे, चूँकि उन्हें भविष्य में कभी सरकारी नौकरी करना ही नहीं है तो चरित्र प्रमाण से कोई मतलब नहीं है, उनके पास कोई बड़ा एसेट ही नहीं है खोने को! और आपको, क्या आप ने अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचा है?
ठीक उसी प्रकार से सैयद सालार मसूद गाजी के सालाना उर्स पर रोक किसने लगाई? एक ASP ने, ज्यूँ ही अदालत में यह मामला जायेगा तो सरकार को मुंह की खानी पड़ जाएगी और उस उर्स मेला की इजाजत ऊपरी अदालत से आसानी से मिल जाएगी। सरकार और प्रशासन को फटकार लगेगी सो अलग और उसी ASP को उक्त मेला की सुरक्षा करनी पड़ जाएगी। और वो लोग हमलोगों को मुंह चिढ़ाते हुए दुगना उत्साह से उस मेला का आयोजन करेंगे!और हमलोग सारा गुस्सा सोशल मीडिया पर अदालत पर निकाल करके संतोष करके अगली बार मार खाने के लिए बैठ जायेंगे।

इन समस्याओं के पीछे का असली कारण क्या है? आइये इसपर थोड़ा विचार करते हैं!
क्या आपने कभी सोचा है की यह औरंगज़ेब की मज़ार या गाज़ी का उर्स या चाँद मियां की मज़ार (साई-बाबा की मस्जिद) इतना फल-फूल रहा है क्यों? और आज इस औरंगज़ेब का मुद्दा पिछले एक महीनों से इतना गरमाया क्यों है? मैं बीबीसी की एक रिपोर्ट देख रहा था, की वहां औरंज़ेब की कब्र के कारण वहां सैकड़ों की संख्या में समुदाय विशेष की फल-फूल की दुकानें, उर्स मेला में लगने वाली हज़ारों की संख्या में उसी समुदाय की दुकानें, चाँद मियां की तो बात कीजिये ही मत, और इन सबके ग्राहक कौन हैं? हज़ारो-हज़ारों की संख्या में हिन्दू ग्राहक जिन्हे इनसबों का वास्तविक इतिहास कभी बताया ही नहीं गया, या वो सेकुलरिज्म के झूठे चासनी में डूबकर मस्त पड़े हुए हैं!
एकदम निचले स्तर तक अपना सन्देश पहुँचाने में सफल रही हैं नयी फिल्म "छावा", जिससे इतिहास में औरंगज़ेब द्वारा संभाजी महाराज पर की गयी क्रूरता को परदे पर देखकर सामान्य लोग विचलित हुए बिना नहीं रह सकें, क्यूंकि उनके सामने औरंगज़ेब की छवि "एक शासक जो अपना खर्च निकालने के लिए खुद से अपनी टोपियां सिलता रहता था ऐसी बतलायी गयी थी! उसी प्रकार उसे महाराजा सुहेलदेव जिन्होंने उस गाज़ी को जहन्नुम तक पहुँचाया था, किसी इतिहास की किताबों में पढ़ाया ही नहीं गया था, इस कारण सामान्य लोग इस वास्तविक इतिहास से अब तक अनभिज्ञ हैं!
वहीँ दूसरी तरफ उनलोगों ने अपने बच्चों में इनकी महानता के किस्सों को कूट-कूट कर भर दिया है, उनलोगों ने इसका इतिहास अपनी खुद की किताबों में बड़े विस्तार से घटनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर लिखा हुआ है, हमारे लिए यह आक्रांता उनके लिए उनके आदर्श हैं, आलमगीर, गाज़ी, वलीउल्लाह आदि हैं जिन्होंने इनके दीन की असीमित खिदमत की है, इसलिए उनके ऊपर आक्रमण, यह लोग अपने आस्तित्व की लड़ाई समझ कर लड़ते हैं! जबकि हमारे नेता इन विरोधों के बहाने अपना वोट बैंक बढ़ाने का जुगाड़ समझते है इसलिए हमें इसका समाधान खुद से तलाशना होगा!


आईये थोड़ा इसका समाधान ढूंढने का प्रयास करते हैं!
हमारे शहर पटना में ज्यूँ ही आप इसके मुख्य रेलवे स्टेशन पटना जंक्शन पर उतरते हैंसामने एक विशाल-भव्य हनुमान जी का मंदिर दिखायी पड़ेगाजिसे महावीर मंदिर के नाम से जाना जाता हैवहीँ पास में जामा मस्जिद भी हैपरन्तु इस हनुमान मंदिर की चकाचौंध के आगे उस जामा मस्जिद की चमक आपको फीका दिखेगा और इस मंदिर की विशालताउक्त मस्जिद को मानो चारो ओर से मानो ढक देती है। यह मंदिर हमेशा से ऐसा नहीं थाबल्कि 40 वर्ष पूर्व वहां एक छोटा सा मंदिर दिखता थाऔर हमलोग उस मंदिर और मस्जिद को देखकर अपने मन-ही-मन में हीनता का अनुभव करते थे! प्रत्येक शुक्रवार को वहां इतनी संख्या में नमाज़ी जुट जाते थे की उस समय उस मंदिर में पूजा के लिए जाने वाले लोगों को भरी कष्ट का अनुभव होता था। फिर एक पुलिस अधिकारी आयेऔर उन्होंने इस छोटे से मंदिर को विशाल बनाने की ठानी और देखते ही देखते यह हनुमान जी का मंदिर उक्त जामा मस्जिद की चमक को ही फीका करके हिन्दुओं के गौरव का प्रतीक बन गया। मंदिर के बाउंड्री बन जाने के कारण मज़बूरन नमाज़ पढ़ने वालों को ही जगह मैनेज करना पड़ता है। उस अधिकारी ने हिन्दुओं के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उक्त मस्जिद को छोटा करने या उससे टकराने के बजाये खुद को बड़ा बना कर उस विचारधारा को छोटा कर दिया! ठीक ऐसा ही कुछ काशी विश्वनाथ मंदिर और सरदार पटेल की मूर्ति बनाने में किया गयायह दोनों अपना गुप्त सन्देश देने में 100% कामयाब हुए!
इसी प्रकार क्या उस औरंग के कब्रगाह से पास में दोनों तरफ ज़मीन खरीद कर एक तरफ छत्रपति शिवाजी और दूसरी तरफ संभाजी महाराज के भव्य स्मारक नहीं बनाये जा सकते हैंजहाँ इन अत्याचारी के अत्याचारों को ऑडियो/वीडियो चित्रांकन के द्वारा व्यापक रूप से दर्शाया जायेलोगो को उस मज़ार पर न जाने का नम्रता पूर्वक अनुरोध किया जायेधीरे-धीरे लोगों में जब जागरूकता आने लगेगी तब खुद-व-खुद लोग वहां जाना बंद कर देंगे! उसी प्रकार संभल में महाराजा सुहेलदेव का स्मारक बनाया जायेउर्स में जाने वाले हिन्दुओं को गुलाब का फूल के साथ उस गाज़ी के अत्याचारों का पम्पलेट छपाकर उनके बीच वितरित किया जायेऔर फिर देखिये परिवर्तन की आहट हर तरफ दिखने लगेगीचाहे अजमेरहोशिरडी हो या कहीं औरउनसे टकराव के बदले नवनिर्माण की सोच उनको स्थायी रूप से पीछे कर सकती है!
एक और उदाहरण से यह स्पष्ट हो जायेगाकुछ समय पहले भगोड़े ज़ाकिर नायक के झूठे भाषणों से आकर्षित होकर हज़ारों हिन्दू रोज़ धर्म-परिवर्तन कर रहे थे। जब से इन एक्स-मुस्लिमों का प्रभाव शुरू हुआऔर इस्लाम के अंदर की सच्चाई बाहर आकरआमजनो तक पहुंचने लगीतो उन कठमुल्लों में हड़कंप मच गयाजिसके चलते एक तरफ नए धर्मपरिवर्तन की संख्या में असाधारण तौर पर कमी आ गयी तो दूसरी ओर उनके घरों में से घर-वापसी की खबरें आनी शुरू हो गयी। बस कुछेक हिन्दुओं ने थोड़ा सा उन एक्स मुस्लिमों को सपोर्ट कियाऔर परिवर्तन की लहर चल पड़ी! अब लोग उनके झूठे भ्रामक प्रचारों का उत्तर उनके मुंह पर पुख्ता सबूतों के साथ मारना शुरू कर दिया है और उनके झूठ का बनाया पूल धीरे-धीरे गिरना शुरू हो गया!
पुरे विश्व में इस कट्टरपंथी विचारधारा के खिलाफ कुछ न कुछ हो रहा हैक्यों न हम लोग भी ऐसा कुछ करने की शुरुआत करें! अपने बच्चों को अपना जातिगत कामस्व-रोजगार की तरफ प्रेरित करके भी बहुत कुछ हासिल कर सकते हैंबहुत से व्यवसाय पर उनका एकाधिकार स्थापित हो चूका हैऔर हमारे बच्चे 10-15 हज़ार की नौकरी के लिए भी चप्पल घिसते रहते हैआइये कुछ नया सोचें!

किसलय अपहरण कांड 2005 बिहार, पटना

 "मेरा किसलय कहाँ हैउसे लौटा दो!"

दैनिक जागरण ने अपने पिछले 25 वर्षों के पुनावरलोकन के क्रम में एक खबर प्रकाशित की है, जिसका शीर्षक है "मेरा किसलय कहाँ है, उसे लौटा दो!"!

यह मामला 18 जनवरी 2005 का है, जब पटना के डीपीएस स्कूल में पढ़ने वाले छात्र किसलय का स्कूल जाने के क्रम में अपहरण कर लिया गया था जिसके बाद किसलय के सहपाठियों और अन्य छात्रों ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ ऐ पी जे अब्दुल कलाम को पत्र लिखा था,  तथा प्रतिदिन बिहार के विभिन्न समाचार पत्रों में इसके विरूद्ध प्रदशन की तसवीरें प्रमुखता से छापा था  और तभी 27 जनवरी 2005 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने चुनाव प्रचार के क्रम में पटना के गाँधी मैदान से "मेरा किसलय कहाँ है, उसे लौटा दो!" हाथ जोड़कर यह अपील की थी जिसके बाद भीड़ भावुक हो गयी थी, तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्तक्षेप के बाद जब यहाँ के राजपाल बूटा सिंह जी ने पटना के वरिष्ठ एसएसपी नयैर हसनैन खान को प्रतिदिन राजभवन में जाकर इस केस के अपडेट देने का निर्देश दिया था तब जाकर इसके चार दिनों बाद और कुल 13 दिनों तक अपहृत रहने के बाद किसलय को सकुशल छुड़ा लिया गया था


इसी तरह 20 सितम्बर 2005 को एक अन्य 9 वर्षीया छात्र गौरव उर्फ़ गोलू का अपहरण कर लिया गया था जिसके बाद पटना हाई कोर्ट द्वारा इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए बिहार सरकार और प्रशासन को यह फटकार लगाई थी की पिछले दस सालों में 1111 लोगों का अपहरण का मामला दर्ज़ हो चूका है, "जड़ से मिटा दें अपहरण करने वालों का नामोनिशान"! गोलू के मामले में हाईकोर्ट ने पटना प्रशासन को यह निर्देश दिया था 17 अक्टूबर 2005 तक हर हाल में गोलू को सकुशल छुड़ा कर कोर्ट को सूचित किया जाये जिसके बाद और हाई कोर्ट में सुनवाई के एक दिन पहले 16 अक्टूबर 2005 को ही गोलू को पटना से मात्र 15 किलोमीटर की दुरी पर हाजीपुर रेलवे स्टेशन पर अपहणकर्ताओं ने गोलू को ट्रैन से उतार दिया था और भाग गए थे


इन दोनों खबरों पर गौर से ध्यान देने पर यह पता चलता है कि दवाब तो पटना एसएसपी पर डाला जा रहा था और उन्हें प्रतिदिन राजभवन तलब किया जा रहा था
या फिर गोलू के केस के सिलसिले में,  हाईकोर्ट तो बिहार प्रशासन को सुनवाई के लिए बुला रहा था और उस पर दवाब बना रहा था, तो इससे अपहरणकर्ता किस तरह से घबरा रहे थे? और किसलय या गोलू को छोड़ दे रहे थे? ऐसा क्या रिश्ता था उस वक्त प्रशासन और अपहणकर्ताओं के बीच जो एक जगह दवाब देने से दूसरी जगह से आउटपुट निकलता था? यह एक गंभीर प्रश्न है जिसका शायद ही उत्तर मिले  गोलू और किसलय तो भाग्यशाली थे कि उन्हें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और हाईकोर्ट का सहारा मिला था, क्या बिहार बाकी बच्चे और नागरिक उस वक़्त उसी तरह से भाग्यवान थे जिनको किसी बड़े हस्ती का सपोर्ट मिलता, हज़ारों लोगों ने उस काल में जैसे-तैसे पैसों को जोड़कर अपहरकर्ताओं को देकर अपनी जान बचाई थी, उस काल को याद करके आज भी सिहरन सी होती है!