Sunday, March 23, 2025

औरग़ज़ेब का महिमामंडन

औरग़ज़ेब को महिमामंडित करने वालों से निपटना आवश्यक है!

* औरंगज़ेब की कब्र नहीं उखाड़ो, बल्कि उसका महिमामंडन करने वालों की मानसिकता खोद डालो!

* आक्रांता सैयद सालार मसूद गाजी के नाम पर उर्स (नेजा मेला) को बंद न करवा कर उस मेले में जाना ही बंद कर दो!


कल दो महत्वपूर्ण घटनाएं प्रकाश में आयी, एक नागपुर और दूसरी संभल, उत्तरप्रदेश से। नागपुर में बिना आगा-पीछा सोचे और बिना पुख्ता तैयारी के औरंगज़ेब की कब्र हटाने के लिए पहुंचे पानी के बुलबुले, जो थोड़ा सा हड़का देने भर से ही अपनी जान बचा कर भागते दिखे। और फँस गए बेचारे वो निर्दोष असावधान हिन्दू नागरिक जो उस जगह अपनी गाड़ियों को बाहर सडकों पर छोड़कर सरकार के भरोसे आराम से निश्चिंत होकर अपने-अपने घरों में आराम कर रहे थे। जबकि उनलोगों ने शायद पहले से ही पुख्ता तैयारीया की हुई थी, और भली-भांति जानते थे की इन समस्या से किस प्रकार से निपटा जा सकता है। तो अंततः नुकसान किसका हुआ? हम आप यहाँ सोच-सोच कर खुश हो रहे हैं, की 50 FIR हो चुकी है, इतनी गिरफ्तारियां हो रही है, CCTV से चेहरों की पहचान हो गयी है, टीवी डिबेट में हमारे प्रवक्ता ने उसको धो डाला, फलां जगह बुलडोजर चला दिया गया, मोदी, योगी, फडणवीस ने हमको बचा लिया आदि। परन्तु क्या आपने कभी सोचा है, की उन गिरफ्तार लोगों में इसका क्या प्रभाव पड़ा? उन लोगों को एकाध सप्ताह में मिलोट से जमानत मिल जाएगी, इस शहर को छोड़ कर किसी दूसरे शहर में जा बसेंगे, चूँकि उन्हें भविष्य में कभी सरकारी नौकरी करना ही नहीं है तो चरित्र प्रमाण से कोई मतलब नहीं है, उनके पास कोई बड़ा एसेट ही नहीं है खोने को! और आपको, क्या आप ने अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचा है?
ठीक उसी प्रकार से सैयद सालार मसूद गाजी के सालाना उर्स पर रोक किसने लगाई? एक ASP ने, ज्यूँ ही अदालत में यह मामला जायेगा तो सरकार को मुंह की खानी पड़ जाएगी और उस उर्स मेला की इजाजत ऊपरी अदालत से आसानी से मिल जाएगी। सरकार और प्रशासन को फटकार लगेगी सो अलग और उसी ASP को उक्त मेला की सुरक्षा करनी पड़ जाएगी। और वो लोग हमलोगों को मुंह चिढ़ाते हुए दुगना उत्साह से उस मेला का आयोजन करेंगे!और हमलोग सारा गुस्सा सोशल मीडिया पर अदालत पर निकाल करके संतोष करके अगली बार मार खाने के लिए बैठ जायेंगे।

इन समस्याओं के पीछे का असली कारण क्या है? आइये इसपर थोड़ा विचार करते हैं!
क्या आपने कभी सोचा है की यह औरंगज़ेब की मज़ार या गाज़ी का उर्स या चाँद मियां की मज़ार (साई-बाबा की मस्जिद) इतना फल-फूल रहा है क्यों? और आज इस औरंगज़ेब का मुद्दा पिछले एक महीनों से इतना गरमाया क्यों है? मैं बीबीसी की एक रिपोर्ट देख रहा था, की वहां औरंज़ेब की कब्र के कारण वहां सैकड़ों की संख्या में समुदाय विशेष की फल-फूल की दुकानें, उर्स मेला में लगने वाली हज़ारों की संख्या में उसी समुदाय की दुकानें, चाँद मियां की तो बात कीजिये ही मत, और इन सबके ग्राहक कौन हैं? हज़ारो-हज़ारों की संख्या में हिन्दू ग्राहक जिन्हे इनसबों का वास्तविक इतिहास कभी बताया ही नहीं गया, या वो सेकुलरिज्म के झूठे चासनी में डूबकर मस्त पड़े हुए हैं!
एकदम निचले स्तर तक अपना सन्देश पहुँचाने में सफल रही हैं नयी फिल्म "छावा", जिससे इतिहास में औरंगज़ेब द्वारा संभाजी महाराज पर की गयी क्रूरता को परदे पर देखकर सामान्य लोग विचलित हुए बिना नहीं रह सकें, क्यूंकि उनके सामने औरंगज़ेब की छवि "एक शासक जो अपना खर्च निकालने के लिए खुद से अपनी टोपियां सिलता रहता था ऐसी बतलायी गयी थी! उसी प्रकार उसे महाराजा सुहेलदेव जिन्होंने उस गाज़ी को जहन्नुम तक पहुँचाया था, किसी इतिहास की किताबों में पढ़ाया ही नहीं गया था, इस कारण सामान्य लोग इस वास्तविक इतिहास से अब तक अनभिज्ञ हैं!
वहीँ दूसरी तरफ उनलोगों ने अपने बच्चों में इनकी महानता के किस्सों को कूट-कूट कर भर दिया है, उनलोगों ने इसका इतिहास अपनी खुद की किताबों में बड़े विस्तार से घटनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर लिखा हुआ है, हमारे लिए यह आक्रांता उनके लिए उनके आदर्श हैं, आलमगीर, गाज़ी, वलीउल्लाह आदि हैं जिन्होंने इनके दीन की असीमित खिदमत की है, इसलिए उनके ऊपर आक्रमण, यह लोग अपने आस्तित्व की लड़ाई समझ कर लड़ते हैं! जबकि हमारे नेता इन विरोधों के बहाने अपना वोट बैंक बढ़ाने का जुगाड़ समझते है इसलिए हमें इसका समाधान खुद से तलाशना होगा!


आईये थोड़ा इसका समाधान ढूंढने का प्रयास करते हैं!
हमारे शहर पटना में ज्यूँ ही आप इसके मुख्य रेलवे स्टेशन पटना जंक्शन पर उतरते हैंसामने एक विशाल-भव्य हनुमान जी का मंदिर दिखायी पड़ेगाजिसे महावीर मंदिर के नाम से जाना जाता हैवहीँ पास में जामा मस्जिद भी हैपरन्तु इस हनुमान मंदिर की चकाचौंध के आगे उस जामा मस्जिद की चमक आपको फीका दिखेगा और इस मंदिर की विशालताउक्त मस्जिद को मानो चारो ओर से मानो ढक देती है। यह मंदिर हमेशा से ऐसा नहीं थाबल्कि 40 वर्ष पूर्व वहां एक छोटा सा मंदिर दिखता थाऔर हमलोग उस मंदिर और मस्जिद को देखकर अपने मन-ही-मन में हीनता का अनुभव करते थे! प्रत्येक शुक्रवार को वहां इतनी संख्या में नमाज़ी जुट जाते थे की उस समय उस मंदिर में पूजा के लिए जाने वाले लोगों को भरी कष्ट का अनुभव होता था। फिर एक पुलिस अधिकारी आयेऔर उन्होंने इस छोटे से मंदिर को विशाल बनाने की ठानी और देखते ही देखते यह हनुमान जी का मंदिर उक्त जामा मस्जिद की चमक को ही फीका करके हिन्दुओं के गौरव का प्रतीक बन गया। मंदिर के बाउंड्री बन जाने के कारण मज़बूरन नमाज़ पढ़ने वालों को ही जगह मैनेज करना पड़ता है। उस अधिकारी ने हिन्दुओं के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उक्त मस्जिद को छोटा करने या उससे टकराने के बजाये खुद को बड़ा बना कर उस विचारधारा को छोटा कर दिया! ठीक ऐसा ही कुछ काशी विश्वनाथ मंदिर और सरदार पटेल की मूर्ति बनाने में किया गयायह दोनों अपना गुप्त सन्देश देने में 100% कामयाब हुए!
इसी प्रकार क्या उस औरंग के कब्रगाह से पास में दोनों तरफ ज़मीन खरीद कर एक तरफ छत्रपति शिवाजी और दूसरी तरफ संभाजी महाराज के भव्य स्मारक नहीं बनाये जा सकते हैंजहाँ इन अत्याचारी के अत्याचारों को ऑडियो/वीडियो चित्रांकन के द्वारा व्यापक रूप से दर्शाया जायेलोगो को उस मज़ार पर न जाने का नम्रता पूर्वक अनुरोध किया जायेधीरे-धीरे लोगों में जब जागरूकता आने लगेगी तब खुद-व-खुद लोग वहां जाना बंद कर देंगे! उसी प्रकार संभल में महाराजा सुहेलदेव का स्मारक बनाया जायेउर्स में जाने वाले हिन्दुओं को गुलाब का फूल के साथ उस गाज़ी के अत्याचारों का पम्पलेट छपाकर उनके बीच वितरित किया जायेऔर फिर देखिये परिवर्तन की आहट हर तरफ दिखने लगेगीचाहे अजमेरहोशिरडी हो या कहीं औरउनसे टकराव के बदले नवनिर्माण की सोच उनको स्थायी रूप से पीछे कर सकती है!
एक और उदाहरण से यह स्पष्ट हो जायेगाकुछ समय पहले भगोड़े ज़ाकिर नायक के झूठे भाषणों से आकर्षित होकर हज़ारों हिन्दू रोज़ धर्म-परिवर्तन कर रहे थे। जब से इन एक्स-मुस्लिमों का प्रभाव शुरू हुआऔर इस्लाम के अंदर की सच्चाई बाहर आकरआमजनो तक पहुंचने लगीतो उन कठमुल्लों में हड़कंप मच गयाजिसके चलते एक तरफ नए धर्मपरिवर्तन की संख्या में असाधारण तौर पर कमी आ गयी तो दूसरी ओर उनके घरों में से घर-वापसी की खबरें आनी शुरू हो गयी। बस कुछेक हिन्दुओं ने थोड़ा सा उन एक्स मुस्लिमों को सपोर्ट कियाऔर परिवर्तन की लहर चल पड़ी! अब लोग उनके झूठे भ्रामक प्रचारों का उत्तर उनके मुंह पर पुख्ता सबूतों के साथ मारना शुरू कर दिया है और उनके झूठ का बनाया पूल धीरे-धीरे गिरना शुरू हो गया!
पुरे विश्व में इस कट्टरपंथी विचारधारा के खिलाफ कुछ न कुछ हो रहा हैक्यों न हम लोग भी ऐसा कुछ करने की शुरुआत करें! अपने बच्चों को अपना जातिगत कामस्व-रोजगार की तरफ प्रेरित करके भी बहुत कुछ हासिल कर सकते हैंबहुत से व्यवसाय पर उनका एकाधिकार स्थापित हो चूका हैऔर हमारे बच्चे 10-15 हज़ार की नौकरी के लिए भी चप्पल घिसते रहते हैआइये कुछ नया सोचें!

किसलय अपहरण कांड 2005 बिहार, पटना

 "मेरा किसलय कहाँ हैउसे लौटा दो!"

दैनिक जागरण ने अपने पिछले 25 वर्षों के पुनावरलोकन के क्रम में एक खबर प्रकाशित की है, जिसका शीर्षक है "मेरा किसलय कहाँ है, उसे लौटा दो!"!

यह मामला 18 जनवरी 2005 का है, जब पटना के डीपीएस स्कूल में पढ़ने वाले छात्र किसलय का स्कूल जाने के क्रम में अपहरण कर लिया गया था जिसके बाद किसलय के सहपाठियों और अन्य छात्रों ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ ऐ पी जे अब्दुल कलाम को पत्र लिखा था,  तथा प्रतिदिन बिहार के विभिन्न समाचार पत्रों में इसके विरूद्ध प्रदशन की तसवीरें प्रमुखता से छापा था  और तभी 27 जनवरी 2005 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने चुनाव प्रचार के क्रम में पटना के गाँधी मैदान से "मेरा किसलय कहाँ है, उसे लौटा दो!" हाथ जोड़कर यह अपील की थी जिसके बाद भीड़ भावुक हो गयी थी, तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्तक्षेप के बाद जब यहाँ के राजपाल बूटा सिंह जी ने पटना के वरिष्ठ एसएसपी नयैर हसनैन खान को प्रतिदिन राजभवन में जाकर इस केस के अपडेट देने का निर्देश दिया था तब जाकर इसके चार दिनों बाद और कुल 13 दिनों तक अपहृत रहने के बाद किसलय को सकुशल छुड़ा लिया गया था


इसी तरह 20 सितम्बर 2005 को एक अन्य 9 वर्षीया छात्र गौरव उर्फ़ गोलू का अपहरण कर लिया गया था जिसके बाद पटना हाई कोर्ट द्वारा इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए बिहार सरकार और प्रशासन को यह फटकार लगाई थी की पिछले दस सालों में 1111 लोगों का अपहरण का मामला दर्ज़ हो चूका है, "जड़ से मिटा दें अपहरण करने वालों का नामोनिशान"! गोलू के मामले में हाईकोर्ट ने पटना प्रशासन को यह निर्देश दिया था 17 अक्टूबर 2005 तक हर हाल में गोलू को सकुशल छुड़ा कर कोर्ट को सूचित किया जाये जिसके बाद और हाई कोर्ट में सुनवाई के एक दिन पहले 16 अक्टूबर 2005 को ही गोलू को पटना से मात्र 15 किलोमीटर की दुरी पर हाजीपुर रेलवे स्टेशन पर अपहणकर्ताओं ने गोलू को ट्रैन से उतार दिया था और भाग गए थे


इन दोनों खबरों पर गौर से ध्यान देने पर यह पता चलता है कि दवाब तो पटना एसएसपी पर डाला जा रहा था और उन्हें प्रतिदिन राजभवन तलब किया जा रहा था
या फिर गोलू के केस के सिलसिले में,  हाईकोर्ट तो बिहार प्रशासन को सुनवाई के लिए बुला रहा था और उस पर दवाब बना रहा था, तो इससे अपहरणकर्ता किस तरह से घबरा रहे थे? और किसलय या गोलू को छोड़ दे रहे थे? ऐसा क्या रिश्ता था उस वक्त प्रशासन और अपहणकर्ताओं के बीच जो एक जगह दवाब देने से दूसरी जगह से आउटपुट निकलता था? यह एक गंभीर प्रश्न है जिसका शायद ही उत्तर मिले  गोलू और किसलय तो भाग्यशाली थे कि उन्हें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और हाईकोर्ट का सहारा मिला था, क्या बिहार बाकी बच्चे और नागरिक उस वक़्त उसी तरह से भाग्यवान थे जिनको किसी बड़े हस्ती का सपोर्ट मिलता, हज़ारों लोगों ने उस काल में जैसे-तैसे पैसों को जोड़कर अपहरकर्ताओं को देकर अपनी जान बचाई थी, उस काल को याद करके आज भी सिहरन सी होती है!

क्या औरंगज़ेब की कब्र को हटा देना चाहिए?

 

इतिहास में सब कुछ हिंसक है, औरंगजेब को ही क्यों चुना जाए?


इस शुक्रवार 21 मार्च 2025 को टाइम्स ऑफ़ इंडिया समाचार पत्र ने अपने संपादकीय लेख में इस शीर्षक से एक एडिटोरियल छापा है, प्रस्तुत है उस आलेख का एक रिव्यु!

हिंदू विरोधी अखबार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने औरंगजेब और हालिया नागपुर के दंगाइयों के समर्थन में एक संपादकीय लेख छापा है। इसमें हिंदुओं को जातियों में बँट कर पूर्वकाल में कथित तौर पर ऊँची जातिओं के द्वारा निचली जाति के लोगों पर किये गए जातिवाद के कारण हुए भेदभाव को इस्लामी अत्याचारों, धर्म-परिवर्तन और अन्य अत्याचारों के समकक्ष बताते हुए औरंगज़ेब और अन्य क्रूर आक्रांताओं को जस्टिफाई करने का प्रयास किया है।

यह संपादकीय आलेखउनके वरिष्ठ एडिटर ‘CHARMY HARIKRISHNAN’ के द्वारा लिखा गया है! उन्होंने शीर्षक में ही लिखा ,"इतिहास में सब कुछ हिंसक है। औरंगजेब को ही क्यों चुना जाएभारत के अतीत के खूनी प्रकरण केवल हिंदू बनाम मुस्लिम नहीं थे। क्रूर यूरोपीय उपनिवेशवाद और जातीय-उत्पीड़न भी है। क्या होगा अगर हर कोई 'सभ्यतापूर्णप्रतिशोध चाहता है?”

 


इसके बाद वह चालाकी पूर्वक औरंगज़ेब के सादगीपूर्ण मकबरा की तुलना उसको अपने पिता के आलीशान मकबरा से करके औरग़ज़ेब को सरल-साधारण शासक दिखाने का प्रयास किया है और चालाकी पूर्वक यह बात छुपा लीकि चूँकि औरंगज़ेब अपने को एक कट्टर इस्लामी शासक के रूप में प्रस्तुत और याद करवाया जाना चाहता था और इस्लाम के मूल में पक्की कब्र बनवाना एक हराम काम माना जाता हैखुद अरब रीजन में हज़रत मोहम्मद के अतरिक्त उनके अन्य सभी साथियों की पक्की कब्रें नहीं बनायीं गयी है इसलिए उसने मरते-मरते अपनी कब्र को पक्का नहीं बनाने की सलाह दे डाली थी इसीलिए उसके मरने के बहुत बाद तक वह कच्ची मिटटी की ही कब्र हुआ करती थी, जिसपर संगमरमर का फर्श और जाली लॉर्ड कर्जन द्वारा बहुत बाद में जोड़ी गई। इसके बाद उन्होंने सवाल पूछा कि "क्या हिंदुत्व का सबसे बड़ा दुश्मन 17वीं सदी का वह सम्राट की कब्र हैजिसपर कुदाल चलाकर हिन्दू अपना "सभ्यतापूर्ण अन्याय का बदला" ले सकेंगे?

आइये पहले इसका जवाब ढूढने का प्रयास करते हैं!

इस बात का जवाब देने से पहले मैं यह समझाना चाहता हूँ कि औरंगज़ेब कि यादों को मिटाना कितना आवशयक "था" ?, ध्यान देने योग्य बात है कि मैं यहाँ था शब्द इस्तेमाल कर रहा हूँ और अपने इस जवाब के समर्थन के लिए मैं प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार अर्नाल्ड टायनबी को उद्घृत करना चाहता हूँ, जिन्होंने दिल्ली में आजाद मेमोरियल हॉल में एक व्याख्यान में कहा था कि प्रथम विश्व युद्ध में पोलैंड पर कब्जे के बाद रूसियों ने राजधानी वारसा में रूसी आर्थोडक्स चर्च का निर्माण कियापर जैसे ही पोलैंड स्वतंत्र हुआवह चर्च तोड़ दिया गया। उसे याद कर टायनबी ने औरंगजेब द्वारा भारत में बनवाई मस्जिदों पर कहा कि वे भी इस्लामी साम्राज्यवाद का प्रतीक थीं। उन मस्जिदों के निर्माण में कोई मजहबी भावना नहीं थी। औरंगजब ने जानबूझकर आक्रामक राजनीतिक उद्देश्य से काशीमथुराअयोध्या आदि स्थानों में मंदिर तोड़कर मस्जिदें बनवाई। टायनबी के शब्दों में, 'वे मस्जिदें यह दिखाने के लिए थीं कि हिंदू धर्म के महानतम पवित्र स्थानों पर भी इस्लाम का एकछत्र अधिकार है। ऐसे स्थान चुनने में औरंगजेब शातिर था। वह एक दिग्भ्रमित बुरा आदमी थाजिसने ऐसी कुख्यात मस्जिदें बनाकर अपने को हिन्दुओं के बीच दहशत का प्रयाय प्रस्तुत करना चाहा और वहीँ अपने मतावलम्बियों के बीच अपनी पहचान दीन के सच्चे-पक्के सेवक के रूप में उकेरी। टायनबी के अनुसार पोलिश लोगों ने रूसियों द्वारा बनाए चर्च को ढहाकर रूसियों की बदनामी का स्मारक भी हटा दियापर भारतीयों ने स्वतंत्र होने पर भी औरंगजेब की बनवाई मस्जिदों को वैसे ही छोड़कर निर्दयी कार्य किया। एक महान इतिहासकार द्वारा दशकों पहले दी गई सलाह कितनी सही थीपर हिंदू नेता उस समय इसके लिए उदासीन बने रहे। फलतः मामला जहां का तहां नासूर की तरह सड़ता रहा। औरंगजेब जैसे इस्लामी शासकों ने भारत में सैकड़ों मंदिर ध्वस्त किए। उनका घोषित उद्देश्य था काफिरों की उपासना पद्धतियों को खत्म कर केवल इस्लामी वर्चस्व कायम करना। यह काम पिछले 1450 वर्षों से इस्लाम के उदय से ही किया जाता रहा है, और सभी इस्लामी शासकों ने दुनिया भर में इसे बाद में दुहराया। हाल में देवबंदी तालिबानअल कायदाइस्लामिक स्टेट आदि ने भी यही करके दिखाया। बामियान की ऐतिहासिक बुद्ध-मूर्तियां तोड़ने पर कई भारतीय उलेमा ने भी तालिबान की बड़ाई की थी। यह औरंगजेबी मानसिकता ही असली समस्या हैलेकिन हिंदू उदारवादीगांधीवादीवामपंथी आदि इस मुद्दे पर स्वयं भ्रमित रहकर सबको भ्रमित करते रहे हैं।



आज़ादी के बाद यहाँ बचे रह गए मुसलमानों ने उसी इस्लामी कट्टरवाद को अपने सीने में दबाये रखा और समय-समय पर वही मतवाद उनके सीनों से बहार निकल कर फुट पड़ता है और उनके कार्यकलापों में स्पस्ट दिखने लगता है। मूल समस्या वही मतवाद हैजो औरंगजेब जैसी मानसिकता वालों को आज भी प्रेरित करता रहता है। ऐसे मतवाद को कठघरे में खड़ाकर इतिहास की खुली जांच-परख की जाए। तभी मुसलमानों में विवेकशील विमर्श पैदा करने में सहायता मिलेगी। यह काम चर्च-मतवाद और कम्युनिस्ट-मतवाद के साथ हो चुका है। यह इस्लामी मतवाद के साथ होना बाकी है। अभी मुसलमान दूसरों को 'काफिर', हीन मानकर बात-बात पर अड़ते हैंक्योंकि वे दोहरी नैतिकता का इस्लामी सिद्धांत मानते हैंजिसमें मुसलमानों के लिए अलगऊंचा और काफिरों के लिए नीचा स्थान रखा गया है। इसीलिए केवल अतिक्रमित मंदिरों पर ही नहींबल्कि विभिन्न सामाजिकसांस्कृतिकराजनीतिक विषयों पर भी मुसलमान अपना विशेषाधिकारी दावा रखते हैं।

अब थोड़ा CHARMY HARIKRISHNAN पर वापस लौटते हैंइसके बाद उन्होंने भारत के इतिहास में हिंदू राजाओं द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ लड़े गए युद्धों तथा ब्रिटेन के लालची उपनिवेशवाद से कलंकित शासकों को चिह्नित करते हुए यह जतलाने का प्रयास किया की, जिस प्रकार से कोई भी वर्तमान हिन्दूचोल सम्राटों से बदला लेने या ब्रिटिश प्रधानमंत्रियों के खिलाफ विरोध मार्च निकालने की कोशिश नहीं करता है। उसी प्रकार से हमें औरंगज़ेब और अन्य मुस्लिम शासकों के अत्याचार को भुला कर आगे बढ़ जाना चाहिए। तो उन्हें यह भी याद रखना चाहिए की भारत की आज़ादी के बाद कई फिल्मों में अंग्रेज़ों के अत्याचारों और बबर्रता को फिल्मांकित किया हैपरन्तु किसी ईसाई मतावलम्बी ने आगे आकर यह विरोध नहीं दर्ज़ करवाया है की उन शासकों को बुरा ना दिखाया जाये और वे इस बात के समर्थन में खड़े रहते हैं कि एक शासक को अपने शासन बनाये रखने के लिए जैसी आवशयकता हुई उसने वैसा किया।

जबकि यहाँ रहने वाले मुसलमानों ने सदियों पहले गुजरे औरंगजेब की भर्तसना को अपने मत के ऊपर हमला मान कर उसी अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। आज के मुस्लिम कट्टरपंथी नेता और मौलवी, मुसलमानों में घमंडी अलगाववादी भावना भरते हैं कि मुसलमानों ने हिंदुओं पर 'सदियों शासन किया और आगे भी करेंगे। हिंदुओं में शासन की क्षमता ही क्या है। वे तो लोभीऊंच-नीचवादी हैं। औरंगजेब तो भला और न्यायप्रिय था। उसकी निंदा करना अनुचित हिंदू सांप्रदायिकता है। आज भी बहुत सारे मुसलमान यह मानकर चलते हैं कि चूँकि मूर्ति-पूजा करना गलत है, और औरंगज़ेब और अन्य मुस्लिम आक्रांताओं ने हिन्दुओं को ऐसा करने से बलपूर्वक रोककर और उन्हें इस्लाम में दाखिल कराकर उन्होंने उन हिन्दुओं को सीधे रास्ते पर ले आकर उनका भला ही किया था। ऐसा उनकी धार्मिक ग्रंथों में लिखा है, और उन्ही बातों को यह कट्टरपंथी अपने बच्चों के पैदा होते ही उसके कोमल मस्तिक में डाल देते है जो उनके बड़ा होने पर कट्टरता का एक विशाल वृक्ष बन जाता है। और वो किसी भी हिन्दू सभ्यता-संस्कृति से घृणा करने लगते है। काश वो भारतीय संस्कृति के मूल में स्थित समानतासहभोजितातथा समानाधिकार आदि जैसे मूल्यों को समझते और अपनी दोहरी नैतिकता वाली सोच में बदलाव लाते, तो हिन्दुओं और अन्य मतालम्बियों के बीच टकराव से बच जाते। आज पूरा विश्व उनकी इसी मानसिकता से पीड़ित हैइसी कारण से यह लोग अपने मताबलम्बियों के बीच में भी शांति पूर्वक एक साथ नहीं रह पातेक्यूंकि यह सिर्फ अपने मान्यता को ही उचित मानते हुए दूसरी सभी मान्यताओं को रद्द कर देना चाहते है। जिसके चलते इनके पैगम्बर के देहत्याग के तुरंत बाद शुरू होकर इनके अपने 57 मुल्कों में आज तक अशांति फैली है। काश यह टाइम्स ऑफ़ इंडिया कि वरिष्ठ स्तंभकार इस पर भी कुछ ध्यान देती, तो मुसलमानों के बीच का आपसी रक्तरंजित संघर्ष और हिन्दुओं में व्याप्त जातिगत संघर्षों में अंतर दिखायी दे जाता। इन्होने इन दोनों को एक समान माना है बल्कि हिन्दुओं के जातीय भेदभाव को इनसे भी  ऊपर एक बड़ी समस्या के तौर पर प्रस्तुत किया है।

इनके अनुसार हिन्दुओं में ऊँची जातियों के द्वारा नीची जाति के लोगों को गरीबी और अशिक्षा में डाल दिया गयाउन्हें शिक्षा और सभ्य नौकरियोंसड़कों तक पहुँचने और मंदिरों में प्रवेश करने बंचित रखा गयाइसके अतिरिक्त उन्हें वास्तविक शारीरिक उत्पीड़नजैसे उन पर मारपीटक्रूरतागुलामी जैसी क्रूरता कि गयीऔर उनसे कठिन श्रम करवाए गए आदि। और यदि इन कथित अत्याचारों और शोषण के विरूद्ध लाखों निचली जातियों के लोग सदियों के उत्पीड़न और बहिष्कार के लिए उच्च जातियों के खिलाफ उठ खड़ी हो जाएंतो भारत में कोई भी ऐतिहासिक इमारत खड़ी नहीं बचेगी। यदि निचली जातियां अपमान और भेदभाव के लिए क्षतिपूर्ति की मांग करती हैंतो हिन्दुओं को मुस्लिम सम्राटों की तुलना में कहीं अधिक बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। इस प्रकार से इन्होने मोटे तौर पर हिन्दुओं के बीच आपसी जातीय वर्ग संघर्ष का डर दिखाने का प्रयास किया।

और इसके लिए उन्होंने पश्चिम बंगाल के कोलकत्ता से मात्र 150 किलोमीटर दूरगिधाग्राम गांव का उदाहरण प्रस्तुत किया जहाँ कथित तौर पर 130 दलित परिवारों को शिव मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा रही थी। जिसे स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद इसी साल मार्च को उस शिव मंदिर में दलितों के प्रवेश कि इजाजत मिली। हमने इस खबर कि थोड़ी पड़ताल की और इंटरनेट पर खोजाऔर यह खबर जहाँ-जहाँ प्रकाशित थी सबको खंगाला। तब हमें उक्त शिवमंदिर की तस्वीर मिली। जो एक छोटा सा मंदिर दिख रहा हैजो लगभग 200 साल ही पुराना है।  एक खबर में गिधाग्राम ग्राम पंचायत के उप-प्रधान पुलक चंद्र कोनार के अनुसार, “स्थानीय जमींदारों ने लगभग 200 साल पहले इस मंदिर की स्थापना की थी। बाद मेंइसे चलाने के लिए एक समिति का गठन किया गया था। दासपारा के लोग मोची समुदाय से अनुसूचित जाति के हैं। उन्हें मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। वे पूजा करना चाहते हैंदूसरे समुदाय उन्हें अनुमति नहीं देंगे। हम बीच-बीच में फंस जाते हैं। हम टकराव और कानून-व्यवस्था की समस्या से बचना चाहते हैं। हम शर्मिंदा हैं।

साथ ही उन्होंने दूसरा उदहारण केरल का दिया जहाँ सदियों पुराने प्रसिद्ध श्री कूडलमाणिक्यम मंदिर के पुजारी हाल ही में उस समय हड़ताल पर चले गए थेजब एक निम्न जाति/ ओबीसी के हिंदू व्यक्ति को देवता के लिए माला बनाने का काम सौंपा गया। मंदिर में माला बनाने के पद 'कझाकम' (Kazhakam) पर नियुक्त किए जाने के बाद मंदिर के उच्च जाति के पुजारियों ने पूजा कराने का बहिष्कार कर दिया था। इस घटना के बाद ओबीसी समुदाय के लोगों ने पुजारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन किया था जिसके बाद मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इस मामले में हस्तक्षेप किया। और फिर देवस्वोम बोर्ड के अध्यक्ष ने मंदिर में जातिगत भेदभाव के आरोपों पर कड़ा रुख अपनाते हुए उस ओबीसी बालू को 'कझाकमके पद पर नियुक्त कर दिया और उन्होंने यह भी कहा कि अगर पुजारी सहयोग नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

यह दोनों घटना को 'CHARMY HARIKRISHNAN' ने अपने सम्पादकीय लेख में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है। जबकि इन दोनों ही घटनाओं में सरकार और उसके द्वारा नियुक्त संस्था ने जातिगत भेदभाव पर कड़ा रुख अपनाते हुए पीड़ितों के साथ उचित न्याय किया। जबकि मुसलमानों के ही एक शिया समुदाय को मुहर्रम के दौरान मातम जुलुस निकालने पर भारत के कश्मीर घाटी में 1990 में प्रतिबन्ध लगा दिया गया थावहां के सुन्नी मुसलमानों के मुकाबले अल्प संख्या में घाटी में रह रहे शिया मुसलमानो को अपने मन-मुताबिक धार्मिक रीती-रिवाज़ों का पालन करने की इजाजत 34 सालों तक नहीं मिलीजिसे सरकार बदलने और धारा 370 हटाने के बाद 2023 में इजाजत मिली। परन्तु भारत के किसी मेनस्ट्रीम मीडिया में इसके विरोध में उस समय एक शब्द भी नहीं लिखा गया था, हाँ इसकी इजाजत मिलने के बाद कुछेक न्यूज़ पोर्टल ने यह समाचार डाला था।

क्या भारतीय मुसलमानों में अपने समुदाय के अंदर जातिगत भेदभाव नहीं हैभारत के मुसलमान यहाँ मुख्यतः तीन जाति समूहों में बंटा हुआ है। इन्हें 'अशराफ़', 'अजलाफ़', और 'अरज़ालकहा जाता है। ये जातियों के समूह हैंजिसके अंदर भी अलग-अलग जातियां शामिल हैं। हिंदुओं में जैसे ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य और शूद्र वर्ण होते हैंवैसे ही अशराफ़अजलाफ़ और अरज़ाल को देखा जाता है। इनके अंदर निचली जातियों के मुसलमानों को पसमांदा मुसलमान कहा जाता है। जबकि यह सारे ही लोग एक ही अल्लाह और एक ही पवित्र पुस्तक और एक ही पैगम्बर को मानते है। और इनके अनुसार इस्लाम सबों के बीच समानता की शिक्षा देता है और आपसी भेदबाह्वऊंचनीच की मान्यता इनके अनुसार इस्लाम में नहीं है परन्तु हकीकत में अगर हम इस्लामी इतिहास पर देखें तो खलीफा का चयन नस्लीय आधार पर होता था। वह कुरैश जनजाति का ही होना चाहिए था। कुछ एक अपवादों को छोड़कर आज भी इस्लामी दुनिया में कुरैश (सैयदशेख) को ही राजनीतिक एवं धार्मिक नेतृत्व प्राप्त है। इनलोगों के इबादत करने के लिए मस्जिदें भी अलग-अलग हैंमरने के बाद दफनाने के लिए कब्रिस्तान तक अलग-अलग हैंएक पक्ष के लोग को इन धार्मिक कार्यों को करने के लिए अपने ही मज़हब के दूसरे पक्ष के पूजास्थलों पर जाने की इजाजत नहीं होतीपकड़े जाने पर जलील करके बाहर कर देने का भी चलन इनके यहाँ है। परन्तु कोई भी मुसलमान इन भेदभाव के ऊपर सार्वजानिक रूप से बात करने से कतराता है क्यूंकि वो अपने समुदाय के बीच एकजुटता का प्रदर्शन करना चाहता हैऔर किसी भी मीडिया समूह पर इस बारे में डिबेट नहीं होती है। एकाध बार एक फिरका के किसी के मर जाने के बाद उसके दफनाए जा चुके शव को कब्र से बाहर निकाल कर वापस उसके घर के दरवाज़े पर छोड़ तक की घटना भी सामने आयी है। कोई भी सरकार चाह कर भी इस तरह के आचरण के विरुद्ध कोई करवाई आज तक नहीं कर पायी।

इतिहास भूलने के लिए नहीं होता है। इतिहास भूल सुधारने के लिए होता है। परन्तु इतिहास प्रस्तुत करने के नजरिया में फर्क होता है। एक नजरिया होता है, इतिहास को आंशिक तौर पर प्रस्तुत करनाजिससे लेखकअपने नेरटिव को आगे बढ़ाने का काम करते हैंइससे समाज में दंगेनफरत आदि भी फैलाई जा सकती हैदेश की सत्ता बदली जा सकती हैक्रांतियाँ कराई जा सकती हैइसीलिए इतिहास जैसे विषय को बहुत सारे कोणों से पढ़ना और समझना होता है। वर्षों से यह झूठा या आंशिक नैरेटिव फैलाया जाता रहा है की ऊँची जातियों के लोगों द्वारा नीची जातियों के दलितों पर किया गया भेदभाव इन दलितों के ऊपर मुगलों के अत्याचार से ज्यादा वीभत्स्व है! आईये देखते है की दलितों के लिए कौन ज्यादा क्रूर थेअंग्रेज मुगल या सवर्ण हिंदू?   

पहले यह समझ लें कि भारत मे दलित कौन थे? भारत मे कर्म अनुसार वर्ण व्यवस्था वनी, जो कालांतर में लोगों द्वारा वही पुश्तेनी कार्य करने से जाति व्यवस्था में बदल गई। पिता के कार्य को ही पुत्र द्वारा अपनाया जाने लगा जिससे वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में और भी सुदृढ होने लग गई। इस व्यवस्था में आप देखेंगे कि वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी उसमे ग्राम में जाति अनुसार ग्राम के मध्य में ब्राह्मण और वैश्य रहने लगे क्योंकि ये समाज को आर्थिक और बौद्धिक रूप से सम्बल देते थे। क्षत्रिय ग्राम में इन लोगों के बाद सुरक्षा के लिये इनके चारो तरफ रहने लगे। शुद्र क्योंकि ये तीनों वर्ग की सेवा करते थे अतः ये क्षत्रिय के बाद ग्राम में चारो तरफ सेवा कार्य जैसे खेती के श्रमिकलोहारमालीसुनारनाइमिस्त्रीधोबी जिंसको आज हम ओबीसी कहते है, रहते थे। इनके बाद ग्राम की एक तरफ सीमा में मांस और चमड़े से सम्बंधित वर्ग रहता तथा उसके साथ ही अलग से मैला ढोने वाला वर्ग रहता था।

दलित वर्ग जिंसको हम चमड़े से सम्बंधित कार्य एवं मेला ढोने वाला वर्ग कह सकते है। यह वर्ग चूंकि ऐसा कार्य करता था जिससे बीमारी होने का अन्य वर्ग में भय रहता इसलिये वह इनसे अछूत की तरह व्यवहार करता जबकि समाज की सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य यानी गंदगी को हटाने का कार्य यही वर्ग करता था। दलित वर्ग से चाहे मुस्लिम हो या ईसाई या अन्य हिन्दू कोई भी पंगा नही लेना चाहता था क्योंकि उसे पता था कि इनके विरोध का मतलव जीवन मे परेशानी को न्योता देना है। अतः अपने आप इन वर्ग ने इनको परेशान नही किया। आप देखेंगे कि इस वर्ग के लोग मुस्लिम भी नही बने क्योंकि ये हिन्दू समाज की गंदगी को दूर करने को सुअर पालते थे। सुअर इस्लाम मे हराम है इसलिये वह इनको मुस्लिम नही बनाते न प्रोत्साहित करते। पाकिस्तान में अभी भी लाखों दलित हिन्दू है जिनको उन्होंने मुस्लिम नही बनाया लेकिन अपना गन्दगी साफ कराने के लिये इनको रखा हुआ है।

वास्तव में दलित पर अत्याचार इसलिए नहीं हुई की वे छोटी जातियों से आते थे, बल्कि इनके किये जाने वाले कार्य की वजह से इनसे दूरी बनाई जाती रही। समस्या तब हुई जब इस वर्ग के लोगों में जागरूकता आई, और इनलोगों ने शिक्षा प्राप्त करने की शुरुआत की। पढ़ने के लिये इनको अन्य वर्ग के वर्ग के बच्चों के साथ वैठना पड़ा। तब इनके साथ पानी पीनेखाने में भेदभाव होने लगा। यानी जब तक दलित इन तीनों धर्म के लोगों की सेवा करते रहेवे अच्छे बने रहे। जैसे ही इन्होंने योग्यता से ऊँची जातियों के लोगों के पास बैठना चाहा, तो इनको अछूत मान कर इनके साथ सौतेला व्यवहार किया गया। इनसे इनमे प्रतिशोध की भावना जागृत हुई। ज्योतिराव फुलेअंबेडकर जो कि इनके समाज से पढ़ लिख गए उनको समाज मे भेदभाव का सामना करना पड़ा। अतः इन्होंने इस भेदभाव का विरोध किया। चूंकि हिन्दू अधिक संख्या में थे और दलित अपने को हिन्दू ही मानते थे अतः इनको हिंदुओ के इस तरह के व्यवहार से पीड़ा अधिक हुई। और तब हिन्दुओं ने स्वयं आगे आकर सदियों से दुहराई जाने वाली इस कुरीति को महसूस किया और इसके भूल-सुधार की कोशिश प्रारम्भ की। और तब हिन्दुओं ने स्वयं आगे आकर सदियों से दुहराई जाने वाली इस कुरीति को महसूस किया और इसके भूल-सुधार की कोशिशे प्रारम्भ की। इस प्रक्रिया में दलितों के नेता माने जाने वाले अंबेडकर से पूना पैक्ट समझौता के तहत इनको चुनाव में कुछ सीटों का आरक्षण दिया। साथ ही संविधान में इस भेदभाव के लिए कड़े कानून बनके उसे प्रतिबंधित करार दिया। बाद में इस आरक्षण को शिक्षा और नौकरी में भी करने का प्रावधान किया गया। इस कदम को सदियों से जारी छुआछूत और भेदभाव से निपटने का एक ऐतिहासिक भूल-सुधार माना जाता है 

आइये देखते हैं की मुगल सम्राट औरंगज़ेब के अपने शासनकाल के दौरान हिंदू नागरिकों के प्रति उसका व्यवहार कैसा था? यहाँ उसने समस्त हिन्दुओं पर एक जैसा व्यवहार किया था यहाँ वो ऊँची और नीची जाति नहीं देखकर बल्कि सभी जातियों के साथ एक जैसा व्यवहार किया करता था  (कुछेक जगहों  पर उसने ब्राह्मणों को कुछ छूट प्रदान की थी!)

* औरंगजेब ने गैर-मुसलमानों पर लगने वाले जजिया कर को फिर से शुरू किया।
* उन्होंने हजारों मंदिरों को नष्ट करा दिया।
* औरंगज़ेब के शासनकाल में, हिंदुओं को घोड़े हाथी और पालकी की सवारी करने की अनुमति नहीं थी।
* औरंगज़ेब ने हिंदू सभा को प्रतिबंधित कर दिया।
* उन्होंने मस्जिद के नक्शेकदम पर कृष्ण मूर्ति को दफनाने का आदेश दिया।
* उन्होंने कहा कि मुस्लिमों के लिए हिंदू मंदिर देखना अनुचित है।
* उसने हजारों हिंदुओं को जबरदस्ती धर्मांतरित किया।
* उन्होंने संभाजी महाराज को प्रताड़ित किया और मार डाला

* उन्होंने शिवाजी महाराज का भी अपमान किया।
* उन्होंने सार्वजनिक रूप से सिक्ख गुरुओं का अपमान किया और दसवें गुरु गोविंद सिंह जी बेटो ज़ोरावर सिंह और फ़तह सिंह को ज़िंदा दीवार में चुनाव दिया था
। औरंगज़ेब ने ही वज़ीर ख़ाँ को आदेश दिया था कि सिखों को मारकर गुरु गोबिंद सिंह को कैद कर ले

इस प्रकार से औरंगज़ेब के द्वारा गैर मताबलम्बियों पर किये गए अत्याचार की एक लम्बी फेहरिस्त हैक्या हिन्दू शाशकों के आपसी संघर्ष में इस तरह की क्रूरता का इतिहास है? दूसरों को तो छोड़िये अंग्रेज़ों ने भी एक लम्बे समय तक हिंदुस्तान पर राज किया।  
हिंदुस्तान को अंग्रेजों या मुगलों, दोनों में से किसने ज्यादा नुकसान पहुंचाया था? बेशक मुगलों ने, मुगल क्रूर, हिंसक जानवरों से भी गये गुजरे थे,अंग्रेजों ने क्या कोई मन्दिर तोडकर चर्च बनाया,,,,,? क्या किसी विश्वविद्यालय को नष्ट किया,,,,,? क्या दूसरों को जबरन धर्मान्तरित किया,,,,,,,? क्या उसने किसी के मान्यता के कारन उसपर कोई विशेष टैक्स लगवाया?

ये सब कुकृत्य धर्मांध मुगलों ने किये। और सभी मुगलों में से सबसे ज्यादा अत्याचार इस औरंगज़ेब ने किया बेशक अंग्रेजों ने हमे लूटा, परन्तु हमारी संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं में कभी दखल नहीं दिया, धर्म को लेकर कोई भी पूर्वाग्रह उनके मन में नहीं था, इसके अलावा भारत में उनके द्वारा ही रेलवे का आधारभूत ढांचा खड़ा किया गया था, उनके ही बनाए संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, धत्रपति शिवाजी रेलवे टर्मिनल, हवाई अड्डे, पुल-पुलिया, बांध आदि आज तक कार्यरत हैं। 

अब इसपर थोड़ा विचार करते हैं की क्या वर्तमान समय में औरंगज़ेब की कब्र हटा देना प्रासंगिक होगी ? तो मेरा जवाब होगा की "नहीं"! क्यूंकि हमारे लिए वर्तमान में औरंगज़ेब कोई समस्या नहीं है। बल्कि हमलोगो के लिए सबसे बड़ी समस्या वह मानसिकता है जो उसका महिमा मंडन करते हैं, उनलोगों ने अपने बच्चों में इनकी महानता के किस्सों को कूट-कूट कर भर दिया है, उनलोगों ने इसका इतिहास अपनी खुद की किताबों में बड़े विस्तार से घटनाओं को तो बढ़ा-चढ़ा कर लिखा हुआ है, परन्तु सामने आने पर उन पर बात करने से भी कतराते हैं। क्यूंकि ऐसा करने से उनका झूठा सेकुलरिस्म का नैरेटिव जो ध्वस्त हो जायेगा। हमारे लिए यह आक्रांता उनके लिए उनके आदर्श हैं, आलमगीर, गाज़ी, वलीउल्लाह आदि हैं जिन्होंने इनके दीन की असीमित खिदमत की है, इसलिए उनके ऊपर आक्रमण, यह लोग अपने आस्तित्व की लड़ाई समझ कर लड़ते हैं! इनलोगों ने अपने दिलों में उसे जगह दी हुई है जबकि हमारे नेता इन विरोधों के बहाने अपना वोट बैंक बढ़ाने का जुगाड़ समझते है इसलिए हमें इसका समाधान खुद से तलाशना होगा! 

औरंगज़ेब की कब्र हटाने की मांग अनावश्यक है। इससे कोई नीतिगत उपलब्धि नहीं होगी । इसके बदले जैसा कवि-चिंतक अज्ञेय ने सुझाया था, अतीत के ऐसे शासकों के स्मारक रहने देने के साथ-साथ वहीं 'इतिहास-वीथी' जैसा संग्रहालय बनाना अच्छा है, जिसमें उनके तमाम काले कारनामे प्रमाणिक रूप में बताए जाएं। इससे सबको जरूरी शिक्षा और अपने लिए आगे सही कर्तव्य भी मिलेगा। मुसलमानों को समान मानवीय नैतिकता स्वीकार करने की ओर ले जाना ही स्थायी समाधान का मार्ग है, सरल और शांतिपूर्ण भी। 

और जहाँ तक टाइम्स ऑफ़ इंडिया का प्रश्न है, इस तरह के फेक नैरेटिव या सेलेक्टिव नैरेटिव फ़ैलाने का उसका एक लम्बा इतिहास रहा है!